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Price (Hard Back) : Rs. 240 only ( ISBN No. 81-902903-0-4 )

Price (Paper Back) : Rs. 96 only ( ISBN No. 81-902903-1-2 )

 

 

अनुक्रम

निवेदन                                                                   
भूमिका
                                                                   
भाग-एक

महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज : गुलाम भारत में संप्रभुता
एवं स्वावलंबन के सूत्रो की खोज

खण्ड-क
हिन्द स्वराज का सभ्यतामूलक संदर्भ      
1.  भारत में कांग्रेस संगठन की तत्कालीन (1909) स्थिति
2.  बंगाल का बंटवारा और इसके परिणाम       
3.  स्वराज का अर्थ एवं प्रकृति

         
खण्ड-ख
आधुनिक सभ्यता की मीमांसा                
1.  आधुनिक प्रजातंत्र की संसदीय प्रणाली         
2.  सभ्यता का दर्शन

                                      
खण्ड-ग
भारतीय सभ्यता के सूत्र

                         
अंश-अ
हिन्दुस्तान की गुलामी एवं आजादी के सूत्र      
1.  हिन्दुस्तान क्यों हारा?               
2.  हिन्दुस्तान कैसे आजाद हो?           
3. इटली और हिन्दुस्तान                            
4.  स्वराज के साधान के रूप में गोला बारूद

  
अंश-आ
अंग्रेजी राज में हिन्दुस्तान की दशा
1.  दिग्भ्रमित भारत                                    
2   आत्म विकास एवं सांस्कृतिक परिष्कार पर जोर        
3. अंग्रेजी राज प्रेरित आधुनिक कुप्रचार       
4. आधुनिक सभ्यता के तकनीक                      
5. राष्ट्र की अवधारणा                           
6.  हिन्दू मुस्लिम संबंधा                    
7.  अंग्रेजी राज में भारतीय वकील एवं जज      
8.  अंग्रेजी राज और ऐलोपैथिक डॉक्टर     

खण्ड-घ
सनातन सभ्यता का नया शास्त्र
1.  सच्ची सभ्यता कौन सी?                          
2.  सत्याग्रह--आत्मबल                                
3. बुनियादी शिक्षा                                     
      निष्कर्ष 

                                                      
भाग-दो
हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता
1.  भूमिका                                                             
2.  लोक परंपराओं का शास्त्र                
3.  भारतीय परंपरा के समकालीन प्रवक्ता        
4.  महात्मा गांधी और उनके आलोचक   
5.  यूरोपीय आधुनिकता एवं समकालीन भारतीय समाज

 

 

निवेदन

इस पुस्तक की रचना-प्रक्रिया लंबी है। इसका प्रारंभ 1984 - 86 के बीच दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनौमिक्स में जे. पी. एस. उबेराय के मार्गदर्शन में शुरू हुआ था। 1985 - 86 में गांधाी और भारतीय परंपरा के बारे में जे. पी. एस. से अनवरत चर्चा होती रही। जे. पी. एस. उन दिनों अपने को यूरोपीय सभ्यता का विशेषज्ञ कहते थे और भारतीय समाज पर कोई लेख लिखने या भारत के बारे में कोई कोर्स पढ़ाने से बचते थे। बाद में उन्होंने सिक्ख धार्म के बहाने मधयकालीन भारत और गांधाी के बारे में एक महत्तवपूर्ण पुस्तक की रचना की। वे महात्मा गांधाी को कबीर, तुकाराम और नानक की परंपरा में रखते हैं। साथ हीं वे गांधाीजी की सर्वोदय (रस्किन की पुस्तक अंटु दिस लॉस्ट पर आधाारित), प्राकृतिक चिकित्सा (नेचर क्योर), ईश्वर की खोज (इन सर्च ऑफ द सुप्रिम), साउथ अफ्रीका में सत्याग्रह (सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका), मेरे सत्य के प्रयोग (माइ एक्सपेरिमेंटस विथ ट्रुथ) जैसी रचनाओं को हिन्द स्वराज की तुलना में ज्यादा महत्तवपूर्ण कृतियाँ मानते रहें हैं।
  
सन् 1986 से 1995 के बीच स्वामी रामकृष्ण (वचनामृत), स्वामी विवेकानंद, स्वामी अभेदानंद, आनंद कुमारस्वामी, धार्मपाल, रामस्वरूप, ए. के. सरण, रामविलास शर्मा, बी. आर. अम्बेडकर, राहुल सांकृत्यायन, आचार्य नरेन्द्रदेव, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, जगन्नाथ उपाधयाय, रेने गुयेनों, मार्को पैलिस, काउण्ट केसरलिंग, सैयद हुसैन नस्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, विद्यानिवास मिश्र, एन. के. बोस, आशीष नंदी एवं भीखू पारेख आदि की रचनाओं के आधाार पर अपने समाजशास्त्रीय ज्ञान को परिमार्जित करता रहा। इसी प्रक्रिया में समाजशास्त्र और इंडोलॉजी (भारत-विद्या) के आपसी संबंधाों को समझने के लिए बंगाली पुनर्जागरण, यूरोपीय पुनर्जागरण्ा एवं ज्ञानोदय, यूरोपीय धार्म सुधाार आंदोलन एवं यूरोपीय धार्म सुधाार विरोधाी आंदोलन एवं सभ्यताओं के तुलनात्मक अधययन की प्रेरणा मिली।
  
इस बीच जे. पी. एस. उबेराय के अलावे स्वामी मुक्तानंद सरस्वती, धार्मपाल, विद्यानिवास मिश्र, किशन पटनायक, सी. एन. वेणुगोपाल, योगेन्द्र सिंह, पैट्रिसिया उबेराय, टी. के. उम्मेन, एम. एस. ए. राव, आंद्रे बेते, ए. एम. शाह, टी. एन. मदान, अमिताभ घोष, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, जे. एस. गांधाी, आर. के. जैन, जे. के. बजाज, बनवारी, एम. एन. पाणिनी, दीपांकर गुप्ता, नंदू राम, इहसानुल हक, तिपलुत नौंब्री एवं राकेश कपूर से भारतीय समाज, संस्कृति एवं सभ्यता के तुलनात्मक अधययन की दृष्टि से महत्तवपूर्ण बातचीत होती रही। इनमें स्वामी मुक्तानंद सरस्वती, धार्मपाल एवं वेणुगोपाल की गांधाी एवं भारत के बारे में दृष्टि जे. पी. एस. उबेराय की दृष्टि से थोड़ी अलग रही है। जे. पी. एस. उबेराय आधाुनिक पश्चिमी सभ्यता में विज्ञान एवं तकनीक की भूमिका को सर्वोपरि मानते हैं जबकि मुक्तानंद सरस्वती एवं वेणुगोपाल विज्ञान एवं तकनीक की तुलना में मानवतावाद जैसे सामाजिक मूल्यों एवं मनुष्य केंद्रित आधाुनिक कला की भूमिका को ज्यादा महत्तवपूर्ण मानते हैं। मुक्तानंद सरस्वती पर महात्मा गांधाी, विनोबा भावे एवं भारत की पौराणिक परंपरा का प्रभाव रहा है जबकि वेणुगोपाल पर कुमारस्वामी एवं जी. एस. घुर्ये का प्रभाव रहा है। धार्मपाल भी जे. पी. एस. की तरह गांधाीवादी विद्वान हैं लेकिन वे भी पश्चिमी सभ्यता में विज्ञान एवं तकनीक की तुलना में प्रबंधाकीय कौशल एवं साम्राज्यवादी नौकरशाही की भूमिका को ज्यादा महत्तवपूर्ण मानते हैं। स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधाी की दृष्टि में आधाुनिक सभ्यता एवं भारतीय सभ्यता का परस्पर संबंधा अलग-अलग स्वरूपों में अभिव्यक्त हुआ है। आधाुनिक यूरोपीय सभ्यता के बारे में भारत में मूलत: तीन दृष्टिकोण रहे हैं :- (1) आधाुनिक यूरोप मूलत: ग्रीक एवं रोमन पैगनिज्म का पुनर्वतरण है। खासकर इसकी विज्ञान-तकनीक, प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं एवं प्रबंधाकीय तकनीक का भारतीय परंपरा के साथ अद्भुत साम्य है। (2) आधाुनिक यूरोप की सभ्यता मूलत: ईश्वर विरोधाी एवं ईश्वर-निरपेक्ष सभ्यता है जिसकी अभिव्यक्ति साम्राज्यवादी संरचना को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करने में हुई है। इस सभ्यता का आधाार स्वार्थ, लालच एवं भोग की राक्षसी प्रवृत्तिा है। इस दृष्टि के अनुसार आधाुनिक यूरोपीय सभ्यता में व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन का आधाार धार्म एवं आस्था के बदले मानवनिर्मित एवं मानवकेन्द्रित (संवैधाानिक) कानून है। इस तरह के कानून के केन्द्र (न्यायालयों) में सत्य के बदले तर्क को महिमामंडित किया जाता है और निष्पक्ष कानून को फख्र से अंधाा एवं बहरा माना जाता है। फलस्वरूप वकील के तर्क एवं गवाह का पक्ष सत्य एवं न्याय पर भारी पड़ जाता है। पहले प्रकार की दृष्टि का आरंभ असजग रूप में स्वामी विवेकानंद की रचनाओं में देखा जा सकता है जबकि इसकी सजग अभिव्यक्ति रामस्वरूप की रचनाओं में है। हिन्द स्वराज और महात्मा गांधाी की दृष्टि मूलत: दूसरे प्रकार की है।
(3) इसी क्रम में एक दृष्टिकोण भारतीय माक्र्सवादियों का भी रहा है। वे मानते हैं कि आधाुनिक यूरोपीय सभ्यता का आधाार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था एवं प्रजातांत्रिक राज्यव्यवस्था है। कार्ल माक्र्स खुद मानते थे कि पूंजीवाद का विकास उत्पादन की शक्तियों और उत्पादन के संबंधाों के बीच द्वंद्वात्मक संबंधाों पर आधाारित होता है। उत्पादन की शक्तियों में परिवर्तन का आधाार विज्ञान एवं तकनीक होते हैं जबकि उत्पादन के संबंधाों का आधाार उत्ताराधिाकार, श्रम एवं वितरण आदि से संबंधिात कानून होते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का आधाार भी कानून और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था होती है। भारतीय विश्वविद्यालयों में माक्र्सवादी दृष्टिकोण ज्यादा लोकप्रिय है जबकि भारतीय समाज में पहले वाले दोनों दृष्टिकोण ज्यादा लोकप्रिय हैं। कुल मिलाकर माक्र्सवादियों की दृष्टि को भारतीय समाज में उतना आदर नहीं मिल पाया जितना यूरोपीय समाज में मिला। इसका एक कारण संभवत: यह है कि कानून और विज्ञान-तकनीक का महत्तव उपरोक्त दोनों दृष्टिकोणों में आ ही जाता है। भारतीय समाज में माक्र्सवादी दृष्टिकोण के लोकप्रिय नहीं होने का एक अन्य कारण इसका अनीश्वरवादी एवं अधाार्मिक होना भी माना जाता है। राहुल सांकृत्यायन, डी. पी. मुखर्जी एवं रामविलास शर्मा जैसे कुछ भारतीय  माक्र्सवादियों ने माक्र्स की विश्लेषण पध्दति और भारतीय परंपरा के बीच समन्वय करके अपनी दृष्टि प्रस्तुत करने की कोशिश की। इसमें यूरोपीय सभ्यता के बारे में इनकी दृष्टि तो माक्र्सवादी बनी रही लेकिन भारतीय सभ्यता को समझने के लिए इन लोगों ने माक्र्सवादी दृष्टि को अपर्याप्त माना। परंतु भारतीय परंपरा के स्वरूप के बारे में राहुल सांकृत्यायन की बौध्द दृष्टि एवं रामविलास शर्मा की वैष्णव दृष्टि में अंतर्विरोधा बना रहा। डी. पी. मुखर्जी पर बंगाल नवजागरण की आधाुनिकता का प्रभाव ज्यादा था फलस्वरूप वे भारतीय परंपरा की सांप्रदायिक धााराओं का महत्तव ठीक से समझ नहीं पाये।

मैं हिन्द स्वराज को भारतीय सभ्यता के समकालीन विमर्श का आकर ग्रंथ मानता हूँ चूँकि इसमें तीनों प्रकार के दृष्टिकोणों से संबंधिात सवालों का भारत के ऐतिहासिक संदर्भ में विश्लेषण करने की कोशिश की गई है। अत: गांधाी और हिन्द स्वराज के सांस्कृतिक संदर्भों को समझने की प्रेरणा बलवती होती गई। हिन्द स्वराज के बारे में यह धाारणा रूढ़ है कि इस पर रस्किन, टाल्सटाय एवं थोरो जैसे विदेशी विद्वानों का प्रभाव ज्यादा है। दूसरी ओर हिन्द स्वराज के मूल पाठ के ऐतिहासिक संदर्भ एवं इसमें प्रयुक्त अवधाारणाओं के सांस्कृतिक संदर्भ पर भारत की सनातन परंपराओं का प्रभाव भी स्पष्ट है। असल में हिन्द स्वराज एक सभ्यतामूलक विमर्श है जिसका उद्देश्य पारंपरिक संस्कृति एवं आधाुनिक संस्कृति के बीच का अंतर्विरोधा स्पष्ट करना है ताकि भारत के आम नर-नारियों को स्वराज की अनुभूति प्राप्त हो सके।
  
सन् 1995 के आस-पास मुझे हिन्द स्वराज के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने के लिए विश्वविद्यालयी विमर्श की पश्चिम-परस्ती एवं विश्वविद्यालय के बाहर होने वाले विमर्श की संप्रदाय सापेक्षता के कारण पैदा होने वाले असंतुलन का अहसास होने लगा। फलस्वरूप मैंने भारतीय संप्रदायों पर स्वतंत्र एवं तुलनात्मक अधययन तथा चिंतन शुरू कर दिया। मेरा जन्म एक सनातनी परिवार में हुआ था और मेरे पिताजी वाचिक परंपरा के गहरे विद्वान हैं। ज्योतिष एवं आगम-निगम की परंपरा में उनकी गहरी साधाना रही है। परंतु वे भगवान बुध्द और महात्मा गांधाी को सहानुभूतिपूर्वक कभी समझ नहीं पाये। 1995 तक अगर मैं विश्वविद्यालयों के विमर्श की मुख्यधाारा से दूर जा चुका था तो पिताजी की सनातनी परंपरा से भी खुद को पूरी तरह सहमत नहीं पाता था। इसी बीच आचार्य नागार्जुन एवं आचार्य असंग की बौध्द उपासना पध्दति के प्रति मेरा अनुराग बढ़ा और 1995 से 2000 के बीच का अधिाकांश समय वैदिक परंपरा एवं श्रमण परंपरा के अंत:संबंधा समझने में लगा। 1993 से 1999 के बीच मैं जनता वैदिक कॉलेज, बड़ौत के स्नातकोत्तार विभाग में समाजशास्त्र का शिक्षक था। बड़ौत में ही रहकर भरत सिंह उपाधयाय ने बौध्द एवं जैन परंपरा का गहन अधययन किया था। उनकी पुस्तकें पढ़नें का सौभाग्य मिला। बड़ौत जैन विद्या के अधययन के लिए भी बहुत शुभ रहा। बड़ौत आर्य समाज का भी महत्तवपूर्ण गढ़ रहा है। आर्यसमाज के साहित्य का भी अधययन किया। बड़ौत में सनातनी परंपरा को समझने के लिए स्वामी कृष्णाबोधााश्रम महाराज, स्वामी करपात्री महाराज, स्वामी अखंडानंद तथा उड़ियाबाबा के उपदेशों एवं मधाुसूदन ओझा तथा गिरिधार शर्मा चतुर्वेदी की रचनाओं से परिचित होने का सौभाग्य मिला। आचार्य रजनीश की कृति महावीर : मेरी दृष्टि में एवं गोरखनाथ पर उनके प्रवचनों को भी देखने का अवसर मिला। तिलक महाराज, समर्थ रामदास, संत तुकाराम एवं संत ज्ञानेश्वर की रचनाओं को भी मूलत: इसी दौरान समझ पाया। रामकृष्ण वचनामृत एवं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का संबंधा भी इसी बीच समझा। संप्रदायों एवं अखाड़ों का इतिहास भी इसी क्रम में हाथ लगा।
  
1999 में मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शिक्षक बनकर आया। 1986 से 1993 तक मैं यहाँ शोधाार्थी रह चुका था। यहाँ मुझे आधाुनिक भारतीय सामाजिक चिंतन नामक कोर्स पढ़ाने का अवसर मिला। इसमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधाी, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, श्रीअरबिंदो एवं आनंद कुमारस्वामी का तुलनात्मक शिक्षण करने का अवसर मिला। इस तुलनात्मक अधययन में विवेकानंद के साथ स्वामी रामकृष्ण की; महात्मा गांधाी के साथ नेहरू, जिन्ना, सावरकर एवं टैगोर की; डा. अंबेडकर के साथ फुले, नायकर और लोहिया की; श्रीअरबिंदो के साथ स्वामी दयानंद, ऐनी बेसेन्ट और अल्लामा इकबाल की; आनंद कुमारस्वामी के साथ राममोहन राय, विद्यासागर, तिलक, राणाडे एवं सर सैयद अहमद ख्रा की दृष्टि पर चर्चा होती रहती थी।  हिन्द स्वराज को समझने में इससे सुविधाा हुई। सन् 2003 एवं 2004 के बीच कौटिल्य संस्थान, सोसाइटी फॉर इंडियन थॉट एण्ड एक्शन (संक्षेप में, सीता) एवं शाश्वत भारती के तत्तवाधाान में मुझे हिन्द-स्वराज के बीस अधयायों पर व्याख्यान देने का अवसर मिला। इन व्याख्यानों पर हुई परिचर्चा से भारतीय सभ्यता के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों के बीच बहने वाली सनातनी धाारा को समझने का मौका मिला। इसमें शाश्वत भारती के संस्थापक बाबा श्री श्रीपादजी महाराज के उपदेशों से भी बहुत प्रेरणा मिली। हिन्द स्वराज के मूल पाठ (टेक्स्ट) एवं इसके सभ्यतामूलक विमर्श पर मैंने जो व्याख्यान दिया था उसी का संशोधिात रूप अब पुस्तकाकार प्रकाशित किया जा रहा है। इसके संशोधान में वागीश शुक्ल, रबीन्द्र रे, आनंद कुमार, अभिजीत पाठक, सतीष जैन, मकरंद परांजपे, ओ. पी. भसीन, राकेश हरिप्रिया, गोविंदाचार्य, मैनेजर पाण्डेय, अश्विनी कुमार, दीपेन्द्र पाठक, मिथिलेश कुमार त्रिपाठी, लक्ष्मीनिवास झुनझुनवाला, सिंजा सिंह एवं अशोक मल्होत्रा के साथ हुए संवादों से बहुत लाभ हुआ है। जे. एन. यू., कौटिल्य संस्थान, सीता, शाश्वत भारती के साथियों तथा जे. एन. यू. के मेरे विद्यार्थियों एवं कौटिल्य संस्थान के शोधाार्थियों की प्रतिक्रियाओं एवं जिज्ञासाओं ने भी दिशा निधर्ाारण में मदद की। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करने में प्रभात कुमार एवं उनके साथियों ने बहुत मेहनत की। इसके कुछ अंशों का प्रकाशन 'भारतीय पक्ष' में हो चुका है। इस के संपादक मंडल एवं नागेन्द्रपति की प्रतिक्रिया उपयोगी थी। हाल के वर्षों में शारीरिक रूप से मैं काफी रूग्ण रहा हूँ। इस बीच मेरे परिवार के सदस्यों, साथियों, छात्र-छात्राओं एवं शुभ चिंतकों ने मुझे बहुत सहारा दिया है। वागीश शुक्ल ने इसकी भूमिका लिखकर संबल दिया है। कौटिल्य प्रकाशन के लोगों ने इसके प्रकाशन में जो उत्साह दिखलाया है उससे मुझे भी अपना श्रम सार्थक लगा है। मैं उपरोक्त सभी लोगों का दिल से आभारी हूँ।

इस पुस्तक के हर वाक्य या हर स्थापना का स्रोत एक पारंपरिक व्यक्ति के रूप में मुझे कहीं-न-कहीं से प्राप्त हुआ है। इस दृष्टि से यह पश्चिमी अर्थों में मेरी लिखी हुई मौलिक रचना नहीं है। किसी भी पारंपरिक समाज एवं सभ्यता में ज्यादातर पुस्तकें इसी प्रकार प्रस्तुत की जाती रही हैं। इस तरह, मैं भी मात्र प्रस्तुर्तकत्ता, संकलर्नकत्ता या संपादक हूँ। परंतु, मेरे प्रस्तुतीकरण में भी कोई मौलिकता नहीं हैं। कलागुरू आनंद केंटिश कुमारस्वामी, उपन्यासकार हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं समाजशास्त्री ए. के. सरण जैसे लेखकों ने बीसवीं शताब्दी में इस बात को बार-बार रेखांकित किया है कि मौलिक लेखन आधाुनिक यूरोप के विद्वानों का फैशनेबुल (लोकप्रिय) शगल है जिसका अंधाानुकरण गैर-यूरोपीय विश्वविद्यालयों के पश्चिम परस्त विद्वानों में भी प्रचलित हो रहा है।
दैव योग से मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का शिक्षक अवश्य हूँ परंतु अपने स्वभाव, पृष्ठभूमि और जीवनानुभव के कारण विश्वविद्यालय की संस्कृति की तुलना में समकालीन भारत के आम नर-नारियों की तरह सनातन भारतीय संस्कृति का ज्यादा प्रतिनिधिात्व करता हूँ। फिर भी, मेरी भाषा में वह सरलता एवं वह ओजस्विता अभी नहीं आ पायी है जो एक आम किसान, मजदूर या गृहिणी की भाषा में पायी जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण मेरी समझ से यह है कि मेरे पेशे की संस्कृति और मेरे व्यक्तिगत जीवन की आस्थाओं और संस्कृति में एक प्रकार का अलगाव और अंतर्विरोधा है जिसे अपनी हर कोशिश के बावजूद मैं अब तक पूरी तरह से दूर नहीं कर पाया हूँ। अपनी इस स्थिति में भी स्वाभाविक बने रहने में मुझे भगवान बुध्द की शिक्षाओं से हमेशा मार्ग-दर्शन और नैतिक बल प्राप्त होता रहा है।

आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है उसमें हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता बढ़ी ही है, घटी नहीं है। यह भारतीय सभ्यता को समझने का सूत्र भी देता है और आधाुनिक पश्चिमी सभ्यता की भारतीय दृष्टि से गंभीर समालोचना भी करता है। उम्मीद है यह पुस्तक हिन्द स्वराज के मूल पाठ को पढ़ने एवं मूल्यांकन करने के लिए प्रेरणा भी देगी और नई दृष्टि से विचार करने के लिए कुछ कच्चा माल भी उपलब्धा करायेगी।

अमित कुमार शर्मा,
सामाजिक व्यवस्था अधययन केन्द्र,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली 110067
                                         
 
ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी,
विक्रम संवत् 2062,
शाका 1927,
बुधावार।
(15 जून 2005)

 

 

भूमिका

'हिन्द स्वराज' महात्मा गाँधाी का दिया हुआ ऐसा दस्तावेज़ है जिसकी चर्चा तो बीच बीच मेँ कुछ समाज-शास्त्री करते रहते हैं किन्तु जिसकी कोई जगह न तो भारत के राजनीतिक कर्णधाारोँ के बीच बन पायी और न ही भारत के बौध्दिाक कर्णधाारोँ के बीच। टाल्सटाय और थोरो के बीच महात्मा गाँधाी को झुलाते हुए हमारे चिन्तकोँ ने उस पृष्ठभूमि को बिलकुल विस्मृत कर दिया जिससे इस पुस्तक का जन्म हुआ था।
वस्तुत: यह पुस्तक न तो कांग्रेस के 'गरम दल' और 'नरम दल' की रस्साकशी की उपज थी न ही यह किसी के विचारोँ से प्रभावित होकर किसी यूटोपिया का भारतीय संस्करण बनाने की चेष्टा थी। जब महात्मा गाँधाी इसे 'काल्पनिक संवाद' पर आधाारित बताते हैँ तो वे केवल इसके शिल्प की बात करते हैँ किन्तु जब वे इसे 'वास्तविक संवाद' पर आधाारित बताते हैँ तो वे इसके कथ्य की बात कर रहे होते हैँ। रेल गाड़ी और पाश्चात्य चिकित्सा पध्दाति का विरोधा करते हुए वे जो कुछ लिखते हैँ उसका 'काल्पनिक संवाद' का पक्ष यह है कि रेल से यात्रा करने से भीड़ भाड़ बढ़ती है और तीर्थ यात्रा का उद्देश्य नष्ट होता है तथा डाक्टर बदहजमी को दूर कर के अनावश्यक रूप से अधिाक भोजन को प्रोत्साहित करते हैँ किन्तु 'वास्तविक संवाद' को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उन्नीसवीँ सदी मेँ रचे गये उन ग्रामीण लोक गीतोँ की ओर धयान न देँ जिनमेँ एक ऐसी स्त्री की करूण गाथा वर्तमान है जिसका पति कलकत्तो मेँ मजदूरी करने रेल पर चढ़ कर गया है और जब तक हम ''कोऽरूक् ? कोऽरूक् ? हितभुक्, मितभुक्'' (कौन निरोग है? कौन निरोग है? जो स्वास्थ्यकर भोजन लेता है, जो थोड़ा भोजन लेता है) जैसी लोक प्रचलित उक्तियों की ओर धयान न देँ।
डा. अमित शर्मा ने सम्भवत: पहली बार स्पष्ट रूप  से, विस्तार से, और प्रमाण-पुष्ट रूप से हमारा धयान 'हिन्द स्वराज' पर चर्चा के बहाने उन्नीसवीँ सदी के भारतीय बौध्दिाक वातावरण के कई अनछुए कोनोँ की ओर आकृष्ट किया है। उन्होँने यह देखा है कि हिन्द स्वराज ''भारतीय दृष्टि से यूरोपीय सभ्यता की सैध्दाान्तिक आलोचना है'' (खण्ड ख का अन्तिम वाक्य)। इस छोटे से वाक्य तक पहुँचने मेँ उन्होंने इस ओर भी संकेत किया है कि जिस तरह विदेशों मेँ ओरियंटलिस्ट और इंडोलाजिस्ट विद्याएँ विकसित हुईँ उस तरह भारत में वेस्टोलाजी (पाश्चात्य-विद्या) विद्या का विकास नहीँ हुआ। 'हिन्द स्वराज' एक गम्भीर अर्थ मेँ चाहे वेस्टोलाजी की पुस्तक न भी हो, उसने इस ओर इशारा ज़रूर किया कि इंडोलाजी का प्रतिकार आवश्यक है और वह वेस्टोलाजी ही हो सकता है।
डा. शर्मा कहते हैँ कि ''इंडिया वालोँ को 'हिन्द स्वराज' अवश्य पढ़ना चाहिए चूँकि हमारी जानकारी मेँ आम भारतीय एवं उनकी सभ्यतामूलक दृष्टि की जैसी सरल एवं सुबोधा अभिव्यक्ति इस पुस्तिका मेँ हुई है वैसी अन्यत्र नहीँ हुई है। साथ ही आम भारतीयोँ को भी आज इस पुस्तक को पढ़ने से बहुत लाभ होगा चूँकि इसमें उनकी सांस्कृतिक दृष्टि से आधाुनिक सभ्यता के मूल्यांकन का जो सूत्र है वह उन्हेँ एक ओर 30 करोड़ इंडियन्स को समझने मेँ मदद करेगा और दूसरी ओर इंग्लैंड के उत्थान एवं पतन को भी समझने की दृष्टि देगा। हमारे इंडियन्स चाह कर भी हमसे अलग नहीँ हो पायेँगे चूँकि अब भी समृध्दा भारतीय लोग उस तरह के आधाुनिक समूह नहीं बन पायें हैँ जिस तरह के आधाुनिक 1909 के आस पास अंग्रेज लोग थे। भारत एक सभ्यता है। इसके आम (74 करोड़) एवं खास (30 करोड़) समूहोँ मेँ अब भी बहुत कुछ साझा है। उदाहरण के लिए, आकांक्षा के स्तर पर दोनों समूह के भारतीय लोग अब भी अपने को ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीँ समझते जबकि यूरोपीय आधाुनिकतावाद के दौर मेँ आम एवं खास अंग्रेज मनुष्य को ब्रह्माण्ड का केन्द्र एवं हर तरह के मूल्यांकन की कसौटी या मानदंड मानने लगे थे।''(पृ. 75 - 76)
यहाँ डा. शर्मा ने पश्चिम मेँ आधाुनिकता को 'ह्यूमनिज्म' के उत्थान से जोड़ा है और शायद यह बेहतर होता कि वे रेनेसाँ (नव जागरण) का कुछ विश्लेषण करते और उसकी जड़ोँ की ओर भी कुछ निगाह डालते किन्तु इन सब के लिए इस पुस्तक मेँ अवकाश नहीँ था। डा. शर्मा के इस उध्दारण पर हम धयान देँ तो कई बातेँ सामने आती हैँ। वस्तुत: यूरोपीय रेनेसाँ तत्कालीन ईसाइयत के शिल्प से अलग होने की तो एक कोशिश ज़रूर थी किन्तु उस ईसाइयत के कथ्य से अलग होने की कोशिश नहीँ थी अपितु एक तरह से उस कथ्य को और पुष्ट करने की ही कोशिश था। सभी संगठित धार्म जो ईश्वर, पुस्तक और ईश्वरीय संदेशवाहक पर आधाारित हैँ, आधाुनिकता का सूत्र अपने भीतर पिरोये हुए हैँ क्योँकि वे प्राणि वर्ग के एक उपसमूह मनुष्य और फिर मनुष्य वर्ग के एक उपसमूह, उस धार्म के अनुयायी, को ईश्वर से विशेषत: सम्बध्दा करते हैँ। स्वत: ही, काल प्रवाह के उस बिन्दु के पहले, जिस बिंदु पर इस संगठित धार्म का प्रारम्भ होता है, सारा मानवीय कर्म हीन हो जाता है और इस प्रकार इतिहास का हिस्ट्री के अर्थ मेँ जन्म होता है। इतिहास का हिस्ट्री के अर्थ मेँ उभरना ही आधाुनिकता है।
इस दृष्टि से डा. शर्मा का यह उध्दारण पाठकोँ के लिए बहुत महत्तवपूर्ण है : ''स्वामी विवेकानंद एवं श्रीअरबिंदो के अनुयायियों ने महात्मा गाँधाी और कुमारस्वामी की उपरोक्त व्याख्या कर के सनातन धार्म और पारंपरिक सभ्यता की पुनर्व्याख्या कर के इतिहास सुधाारने का काम किया है। परंतु सनातन परम्परा मेँ इतिहास को सुधाारने की कोई अवधाारणा नहीँ है।''
(पृ. 150)
जिस 'सनातन परम्परा' का उल्लेख डा. शर्मा ने किया है वह वस्तुत: भारतीय पेगनिज्म (पैगनिज्म) है जिसे हम 'हिन्दू धार्म' के नाम से ग़ैर-भारतीयोँ की मदद से जानते हैँ। 'पेगन' (पैगन) शब्द का भी इस सनातन परम्परा को सूचित करने के लिए डा. शर्मा ने यत्र तत्र उपयोग किया है। जब वे यह बताते हैँ कि महात्मा गाँधाी और कुमारस्वामी ने अपना सनातन हिन्दूपन खोजा था, विरासत के रूप मेँ पाया नहीँ था और यह खोज पूरे जीवन की साधाना का फल थी, किसी गुरू के मार्गदर्शन मेँ एक फ़ार्मूले के तहत नहीँ थी (पृ. 156) तो वे एक ऐसे प्रश्न की ओर भी हमारा धयान दिलाते हैँ जिस पर विचार बहुत आवश्यक हो चला है : क्या कारण है कि सनातन हिन्दूपन की खोज के लिए महात्मा गाँधाी और कुमारस्वामी जैसे चिन्तक की आवश्यकता पड़ती है?
यहीँ हम उस घातक वैचारिकता से टकराते हैँ जिसे 'आधाुनिकता' कहा जाता है। मनुष्य समाज ज्ञात इतिहास के पूर्व पेगन ही था या योँ कहेँ कि 'सनातन हिन्दू' था। पेगन मन मेँ विरासत के दबाव बुनियादी चिन्तन पर नहीँ हैँ, रोज़मर्रा के खान-पान, रहन-सहन और विवाह या मृत्यु जैसे प्रसंगोँ पर हैँ जिन्हेँ सामाजिक संगठन की बुनावट के लिए बनाये नियम माना जा सकता है यद्यपि इनमेँ से कुछ भी नहीँ है जो दैव-मानव अन्त:सम्बन्धा से न संचालित होता है। इसलिए योगवासिष्ठ आराम से कह सकता है कि ऐसे ब्रह्माण्ड हैँ जिनमेँ वेद नहीँ हैँ, ऐसे ब्रह्माण्ड हैँ जिनमेँ वर्णाश्रम नहीँ हैँ, ऐसे ब्रह्माण्ड हैँ जिनमेँ देवता नहीँ हैँ, ऐसे ब्रह्माण्ड हैँ जिनमेँ राम-रावण्ा युध्द मेँ राम की पराजय होती है। विरासत का कोई दबाव ऐसे चिन्तन पर नहीँ होता। पश्चिम मेँ हर स्तर पर पेगनोत्तार सभ्यता इस विरासत के दबाव से कुचली हुई है और आधाुनिक विज्ञान की प्रत्येक ऐसी खोज जो अनेक ब्रह्माण्डोँ की कल्पना करती है, या अकारण काकतालीय सृष्टि की बात करती है, उसके लिए एक चोट और एक चुनौती के रूप मेँ सामने आती है। यह उस विरासत का दबाव ही था जिसने ईसा के छह हजार वर्ष पूर्व मेँ सारी मानव सभ्यता का इतिहास समेंटने की चेष्टा की और वेद, बुध्दा, पाणिनि सब को ईसा के छह सौ वर्ष पहले के आस पास रखवाया। जब विरासत का दबाव नहीँ होता तो आप अपनी खोज अपने आप करने पर विवश होते हैँ। इसलिए प्रत्येक सनातनी हिन्दू अपना धाार्मिक संसार स्वयं बनाता है, इसीलिए प्रत्येक विचारक का एक निजी संप्रदाय बनता है, इसीलिए इतने भेदोपभेद इस समाज की वैचारिक संरचना मेँ मौजूद हैँ। क्योँकि पेगन या सनातनी हिन्दू के सामने प्रश्न तो हैँ, उत्तार नहीँ हैँ। पेगनोत्तार चिन्तनोँ का जन्म केवल एक कारण से हुआ जिसे हम 'आलस्य' कह सकते हैँ। सभी प्रश्नोँ का एक उत्तार केवल ईश्वर हो सकता है जिसके पास एक किताब हो और जिसका एक दूत हो। उस किताब के बाहर ज्ञान नहीँ है और उस दूत के अतिरिक्त कोई मार्गदर्शक नहीँ है। इसलिए 'ईश्वर' के बजाय 'मालिक' कहना ज्यादा ठीक है और 'रिलिजन' की व्युत्पत्तिा 'बन्धान' से की जाती है।
इसके विपरीत, अभिनव गुप्त कहते हैँ कि बन्धान और मोक्ष, सुख और दु:ख, वैसे ही पर्यायवाची हैँ जैसे 'कुम्भ' और 'घट'। यह 'पर्याय वाचिता' का वाचन पेगन चिन्तन मेँ बराबर मिलता है, उदाहरण के लिए प्राचीन यूनान मेँ स्वर्ग और नरक की अवधाारणा नहì