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निवेदन
प्रस्तुत पुस्तक भारत की समकालीन पारंपरिक संस्कृति को समझने का एक प्रयास है। समाजशास्त्र के शिक्षक के रूप में समाज एवं संस्कृति को समझना और समझाना मेरा पेशा है। आञ्ुनिक पश्चिम में विकसित अवञरणाओं के आञर पर भारतीय समाज, अर्थ व्यवस्था एवं राजनीति को समझने की बहुत कोशिश हुई है। भारतीय र्ञ्मों के साम्प्रदायिकता (कम्युनलिज्म) र्ञ्मांञ्ता (फंडामेंटलिज्म) सामाजिक असमानता एवं अंञ्विश्वास के स्रोत के रूप में या वैवाहिक नियमों तथा नातेदारी संबंञें को प्रभावित करने वाले तत्तव के रूप में भी अध्ययन हुए हैं लेकिन भारतीय संस्कृति का व्यवस्थित अध्ययन अब तक नहीं हुआ है। लखनऊ विश्विद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में राञकमल मुखर्जी, डी. पी. मुखर्जी डी. एन. मजुमदार एवं ए. के सरण ने इस ओर कुछ शुरूआती कार्य किया था। इस विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित विद्वानों टी. के. उन्नीथान, इन्द्रदेव, योगेन्द्र सिंह, टी. एन. मदान, आर. के. जैन एवं पी. सी. जोशी जैसे विद्वानों ने भी इस क्षेत्र में अध्ययन जारी रखा। जे. पी. एस. उबेराय एवं सी. एन. वेणुगोपाल जैसे विद्वानों ने भी इस ओर कुछ ध्यान दिया परंतु समाजशास्त्र की मुख्यञरा में भारतीय संस्कृति का समाजशास्त्र विकसित नहीं हो सका। फलस्वरूप भारतीय संस्कृति को समझने के लिए डी. बेरी एवं अन्य द्वारा संपादित ''सोर्सेस ऑंफ इंडियन ट्ैडिशन'' या एस. राञकृष्णन एवं अन्य द्वारा संपादित एवं रामकृष्ण इन्सटीटयुट ऑफ कल्चर, कलकत्ताा द्वारा छ: खंडों में प्रकाशित ''द कल्चरल हेरिटेज ऑफ इंडिया'' या श्रीअंरविंदों की ''फाउन्डेसंस ऑफ इंडियन कल्चर'' और उसका हिन्दी अनुवाद 'भारतीय संस्कृति का आञर' या जवाहरलाल नेहरू की 'भारत की खोज' या आञ्ुनिक पश्चिमी लेखकों से प्रभावित पुस्तकों का इस्तेमाल होते रहा है। उपरोक्त स्रोतों की एक सीमा तो यही है कि इनमें भारतीय संस्कृति का विश्लेषण प्रकाशित पुस्तकाें या लेखों या उद्ञ्रणाें के आञर पर करने का प्रयास किया गया है एवं भारत की वाचिक परंपरा को नजरअंदाज किया गया है। दूसरी सीमा यह है कि इनमें आञ्ुनिकता एवं परंपरा का घालमेल है। यह घालमेल तीनों स्तर पर है : अवञरणा के स्तर पर, अध्ययन पध्दति के स्तर पर और उदाहरणों द्वारा तर्क की संपुष्टि के स्तर पर। तीसरी सीमा यह है कि भारतीय संस्कृति को प्राचीन संस्कृति मानकर इसका स्रोत संस्कृत साहित्य के अंग्रेजी राज में प्रकाशित एवं संपादित संस्करणों के आञर पर (विलियम जोंस एवं मैक्समूलर जैसे पश्चिमी भारतविदों से संवाद बनाकर) लिखी गई है। फलस्वरूप भारत की लोकभाषाओं एवं लोकसंस्कृतियों में उपलब्ञ् लिखित या वाचिक परंपरा का समुचित उपयोग नहीं हुआ है। साथ ही भारतीय संस्कृति के व्यावहारिक एवं समकालीन स्वरूप की जीवंत उपस्थिति को नजरअंदाज कर पुरानी पड़ चुकी पोथी एवं अप्रासंगिक हो चुकी मान्यताओं को मानक के रूप में स्थापित किया गया है।
इसके विपरीत प्रस्तुत पुस्तक भारतीय संस्कृति के व्यावहारिक पक्ष पर केन्द्रित है। इसका एक आञर भारतीय समाजशास्त्र के लखनऊ सम्प्रदाय द्वारा किया गया समाजशास्त्रीय अध्ययन है। इसका दूसरा आञर बिहार, पश्चिमी उत्तार प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, तमिलनाडु एवं कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भारतीय संस्कृति का जीवन पध्दति के रूप में किया गया समाजशास्त्रीय अध्ययन है। तीसरा आञर लोकभाषाओं में उपलब्ञ् साहित्य का अध्ययन है। चौथा आञर आनंद कुमारस्वामी, रामस्वरूप, ए. के. सरण, भरतसिंह उपाध्याय, विद्यानिवास मिश्र, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, मैनेजर पांडे, चंद्रञ्र शर्मा गुलेरी, ओशो रजनीश, जे. पी. एस. उबेराय, एन. के. बोस, योगेन्द्र सिंह एवं टी. एन. मदान जैसे लेखकों के भारतीय संस्कृति के बारे में लेखन का सम्मिलित प्रभाव है। इसका पाँचवाँ आञर श्रीवेंकटेश्वर कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय), जनता वैदिक कॉलेज, बड़ौत (मेरठ विश्वविद्यालय) एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मेरे विद्यार्थी हैं जिन्होंने पिछले 15 - 16 वर्षो में अपनी निर्दोष जिज्ञासा के द्वारा मुझे समाजशास्त्रीय अध्ययन की सीमा को पहचानने और लोक जीवन की सनातनी आस्था के समाजशास्त्रीय तर्क खोजने के लिए प्रेरित किया। इसका छठा आञर विद्यानिवास मिश्र, जे. पी. एस. उबेराय, योगेन्द्र सिंह, सी. एन. वेणुगोपाल, आर. के. जैन, टी. के. उम्मेन, इहसानुल हक, आनंद कुमार, सतीष जैन, गोविंदाचार्य, वागीश शुक्ल, मैनेजर पाण्डेय, अभिजीत पाठक, दीपांकर गुप्ता, नंदू राम, एस. के. भट्टाचार्य, बनवारी, रामबहादुर राय, भूदेव वाजपेयी, बटुकनाथ दूबे, कमलेश शुक्ल, रबीन्द्र रे, अश्विनी कुमार, ओमप्रकाश सिंह, देवेन्द्र चौबे, प्रमोद दूबे, नीलीका मेहरोत्रा, एन. हरीश, ओ. पी. भसीन, अनंत गिरी, मकरंद परांजपे, विवेक कुमार, उदय सहाय, सुष्मिता दासगुप्ता, दीपेन्द्र पाठक, अरविन्द शंकर, राकेश कपूर, रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, सुरेन्द्र शर्मा एवं मिथिलेश त्रिपाठी जैसे व्यक्तियों से हुई अनौपचारिक चर्चाओं में निहित है। इस पुस्तक के लेखन में मेरे पिताजी पं नवलकिशोर शर्मा का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ है।
प्रकृति ने भारत को एक स्वायत्ता भौगोलिक एवं सांस्कृतिक इकाई बनाया है। ऋषियों ने उसकी एकता का साक्षात्कार किया। साहित्य एवं कला ने उसे संवारा। संस्कृति ने उसका श्रृंगार किया। कवि ने गाया। वीरों ने बलिदान दिया कि उसकी ञ्रती माँ सनातन विञन को अपनी गोद में ञरण किए रहे। कैलाश के शंकर और सिंञ्ु की संञ् िपर खड़ी अपर्णा-पार्वती एक हो गए। सिंञ्ु और शिवालय के भौतिक एवं दैनिक मिलन ने इस एकता पर मुहर लगाई। एकता के केन्द्र तीर्थ बन गए। भारतीय संस्कृति भौगोलिक या राजनीतिक - भौगोलिक अर्थ में 'भारतीय' नहीं है। यह भू-सांस्कृतिक अर्थ में भारतीय है। भारत के सभी निवासी इसमें आस्था नहीं रखते। दूसरी ओर, भारत के बाहर रहने वाले कई लोगों की इस संस्कृति में आस्था एवं विश्वास है। भारतीय संस्कृति में कई उपासना पध्दतियाँ स्वीकृत हैं, फलस्वरूप, भारतीय संस्कृति के साझीदार कई सम्प्रदाय एवं कई समुदाय के लोग हैं। इसी तरह, भारत में रहने वाले कुछ लोग अन्य संस्कृतियों के हिमायती भी हैं। इन कुछ लोगों में पश्चिमी शिक्षाप्राप्त बुध्दिजीवियों की एक जमात प्रमुख है जो विभिन्न कारणों से भारतीय संस्कृति से खुद को जोड़ नहीं पाती। भारतीय संस्कृति उन्हें उपहास और नफरत करने लायक चीज नजर आती है। ये लोग भारतीय संस्कृति को प्राचीनता से जोड़कर समकालीन समय में इसे अप्रासंगिक मानते हैं।
ऐसे विद्वानों के विपरीत इस पुस्तक की स्थापना है कि भारतीय संस्कृति को उसके अतीत से नहीं, उसकी समकालीनता या वर्तमानता से पहचानना अञ्कि जरूरी है। अंग्रेजी में जिसे 'कम्पोजिट कल्चर' कहते हैं उसे सामासिक संस्कृति कहने का चलन बढ़ रहा है। भारतीय लोग समास शब्द का अर्थ व्याकरण पढ़ने के क्रम में सीखते हैं। व्याकरण में समास का अर्थ घटकों का योग नहीं होता, घटकों से एकदम अलग होता है। समास का प्रयोजन है घटकों की भूमिका को कम करना, गौण बनाना। दूसरी ओर, 'कम्पोजिट कल्चर' को सामान्यत: घटको का जोड़ माना जाता है। अंग्रेजी राज में भारतीय संस्कृति को हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, बौध्द संस्कृति, जैन संस्कृति, सिक्ख संस्कृति, ईसाई संस्कृति, और जनजातीय संस्कृति का जोड़ मानने की रणनीति शुरू हुई। उपनिवेशवादी विद्वानों ने इस प्रवृत्तिा को व्यवस्थित अभियान के तहत संस्थाबध्द किया। इसके बावजूद, भारतीय समाज में भारतीय संस्कृति की पारंपरिक समझ न सिर्फ बची हुई है बल्कि फल-फूल रही है। प्रस्तुत पुस्तक भारतीय संस्कृति के इसी पारंपरिक स्वरूप के बारे में है।
पारंपरिक भूगोल के अनुसार भारतवर्ष सप्तद्वीपा वसुन्ञ्रा के अन्तर्गत जम्बूद्वीप का एक वर्ष है। इसके उत्तार में हिमालय और दक्षिण में लवण-समुद्र है। यह भोगभूमि होने पर भी विशेषत: कर्म-भूमि है। शीत, ग्रीष्मादि षड् ऋतुओं का संबंञ् तथा विभिन्न प्रकार के परस्पर विरूध्द र्ञ्मों का समन्वय एकमात्र भारतवर्ष में ही दृष्ट होता है। प्रसुप्त शक्तियों के विकास के लिए यह स्वाभाविक क्षेत्र है। भारतीय संस्कृति की गहराई, व्यापकता, विरोञ् - समन्वय - सामर्थ्य और सर्वतोमुख विकास के प्रति प्रतिबध्दता अतुलनीय है। इस संस्कृति की प्रत्येक विद्या, प्रत्येक कला, प्रत्येक शास्त्र तथा प्रत्येक वृत्तिा का उद्देश्य मोक्ष, निर्वाण या कैवल्य है।
भारतीय संस्कृति की सबसे प्रमुख विशेषता कथनी एवं करनी में अद्वैत का आग्रह है। भारतीय संस्कृति ने किसी विचारञरा के आगे कभी समर्पण नहीं किया, न उसने किसी वस्तु को इस दृष्टि से आत्मसात् किया कि उस वस्तु का नामोनिशान न रहे। उसने विविञ्ता तथा अनेकरूपता को बराबर आदर एवं प्रश्रय दिया है। देश के अंदर एवं बाहर कहीं भी उसने अपने आप को आरोपित नहीं किया है। हाँ, उसने प्रत्यारोपण जरूर किया है। जैसे इसने सरकंडे को गन्ने के रूप प्रत्यारोपण के द्वारा विकसित कर सरकंडे में रस भरा। इसने जंगली ञन्य को शालि के रूप में विकसित कर उसमें सुगंञ् दिया। इसने जंगली आम की कलम बनाकर सहकार का विकास किया, उसमें गंञ् और रस दोनों भरा। उसी तरह, काफी पहले भारतीय मूल के व्यक्ति आज के मध्य वियतनाम के चंपा नगर में पहुंचे। वे कौंडिन्य गोत्र से संबंञ्ति थे। उन्होंने एक स्थानीय नागी नाम की कन्या से विवाह किया, वहीं के हो गए। उनके साथ रामायण-महाभारत वहीं के हो गए। रामायण व महाभारत के आख्यानों के रूपांतर भी हो गए। उन्होंने अपने को चंपा में प्रतिरोपित कर लिया। चंपा के मूल निवासियों की कला तथा उस कला के अभिप्राय को उन्होंने नष्ट नहीं किया बल्कि उन्हें नई जमीन दी।
भारतीय संस्कृति का एक प्रतीक बरगद है। यह एक ओर ऊर्ध्वमूल तथा न्योग्रोञ् है। इसका विकास ऊपर की शाखाओं में तो होता है, यह शाखाएँ नीचे भी फेंकता है। भारतीय संस्कृति एकमूल संस्कृति नहीं, अनेकमूल संस्कृति है। यह मूल सहित उखड़कर भी नष्ट नहीं होती। कबीर के शब्दों में यह 'मरजीवा' है; तांत्रिको के शब्दों में 'छिन्नमस्ता' है; वैष्णव भक्तों के शब्दों में 'दरददिवानी' है, गीता के शब्दों में यह ब्रह्महवि है। इसमें जीने की अदम्य आकांक्षा है। भारतीय संस्कृति सदाजीवा दूब की तरह रसगर्भ है। गरमी (संकट-काल) में एकदम सूख जाती है, पर मरती नहीं। पानी पड़ते ही जी उठती है। सदाजीवा को लोकसंस्कृति में दूब कहा जाता है। हर अनुष्ठान में इसका उपयोग किया जाता है। भारतीय संस्कृति के प्रमुख प्रतीकों में गाय, जल, सूर्य, माँ, सदाजीवा दूब और बरगद वृक्ष की चर्चा की जा सकती है। कमल की चर्चा की जा सकती है। बर्तनों में बारहगुणा (बरहगुना) की चर्चा की जा सकती है। अंग-वस्त्रों में अंगोछा या गमछी की चर्चा की जा सकती है। भारतीय संस्कृति में बरहगुना, गमछी या गाय का गोबर, या दलान (बैठक) बहुआयामी एवं बहुउपयोगी वस्तुओं का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में एक ही चीज का बहुत लोगों द्वारा, बहुत तरह से, बहुत बार उपयोग करने की प्रवृति रही है। फलस्वरूप भारतीय संस्कृति में नये शिल्प एवं तकनीक के प्रयोग से पहले इसमें सरलता, बहुआयामी उपयोग, निरंतर उपयोग की संभावना तथा आर्थिक एवं प्राकृतिक दृष्टि से बहुसंख्यक लोगों के लिए लाभदायक होने का गुण देखा जाता है। हमारी परंपरा में तकनीक में परिवर्तन बहुत सोच-समझ कर किया जाता है। हमारे यहाँ प्रयोग एवं परिवर्तन का मानक लोकमंगल तथा र्ञ्मरक्षण रहा है।
भारतीय संस्कृति के केन्द्र में मनुष्य नहीं है। भारतीय संस्कृति के केन्द्र में एक वैश्विक दृष्टि है। भारतीय संस्कृति के केन्द्र में सनातन र्ञ्म है, मानववादी विचारञरा नहीं। भारत में भी मनुष्य तन पाना गौरव की बात माना जाता है। भाग्यवान को मनुष्य तन मिलने की बात हमारी संस्कृति में अक्सर सुनने को मिलती है, लेकिन इसके बावजूद न तो मनुष्य इस ब्रह्मांड का केन्द्र है न मनुष्योतर जीव केवल भोग्य हैं और न मनुष्य इस संसार का भोक्ता है। संत रैदास के शब्दों में मनुष्य मात्र दीया की बाती है (प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी; प्रभु जी, तुम दीया हम बाती)। भारतीय संस्कृति किसी महल की तरह जड़ रचना भी नहीं है। वह जल, दूब और सूर्य की तरह एक निश्चित गंतव्य की ओर चेतन एवं सतत यात्रा है। वह गंतव्य मोक्ष निर्वाण, कैवल्य या आत्म-साक्षात्कार कहलाती है। हमारी संस्कृति में आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्म-साक्षात्कार में गुणात्मक भेद नहीं, परिमाणात्मक भेद है।
ब्रह्म सत्य है और सत्य ब्रह्म है। सत्य एक शाश्वत आग है। उसमें बिना तपे सिध्दि नहीं मिलती। सत्य का अन्वेषण ही सत्य है। सत्य की प्रतीति या साक्षात्कार तीन मार्ग से संभव है : (1) भक्तिमार्ग या निश्छल निष्कपट भाव से। शबरी, निषादराज (रामायण) और गोपियां (श्रीमद् भागवत) सत्य - स्वरूप राम और कृष्ण को निश्छल भाव से साञ्ते हैं।
(2) ज्ञान मार्ग या कठोर तपस्या से। विश्वामित्र, वशिष्ठ, महावीर, बुध्द, पतंजलि, गोरखनाथ जैसे ऋषि कठोर तपस्या के दौरान सत्य का साक्षात्कार करते हैं।
(3) कर्म मार्ग या निर्ममता से या साक्षी भाव से भी सत्य का साक्षात्कार कर सकते हैं। भारत के अञ्किांश नर-नारी इसी मार्ग से सत्य का साक्षात्कार करते हैं। युञ्िष्ठिर, कबीर, रैदास आदि ने इसी मार्ग के द्वारा सत्य की प्रतीति की थी। दरअसल भारत में भक्ति मार्ग की सगुण शाखा में निश्छल निष्कपट भाव की प्रमुखता होती है और भक्ति मार्ग की निर्गुण शाखा में साक्षी भाव से कर्म करने पर जोर होता है। इसके लिए निर्ममता से कर्तृत्व का अभिमान कुचलना पड़ता है। सत्य की प्रतीति के बाद या तो अपार करूणा की अभिव्यक्ति होती है या महान निर्ममता की। भगवान बुध्द अपार करूणा की अभिव्यक्ति हैं तो योगीराज कृष्ण महान निर्ममता की अभिव्यक्ति हैं।
भारतीय संस्कृति का मूल आञर सत्यं, शिवं, सुंदरम की अवञरणा है। हमारे यहाँ सत्य ही शिव तत्तव या परम तत्तव माना गया है। उसे ही अंतिम अर्थो में सुंदर भी माना गया है। असत्य थोड़ी देर के लिए सुन्दरता का भ्रम फैला सकता है लेकिन सनातन सुन्दरता केवल सत्य में ही होता है। भारत में आम लोग इस अवञरणा को भारतीय संस्कृति के मूल वाक्य के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं लेकिन रामचंद्र शुक्ल एवं विद्यानिवास मिश्र जैसे कुछ विद्वानों ने इस पर असहमति जतायी है। विद्यानिवास जी ने एक जगह लिखा है कि ''यह बात ऐतिहासिक दृष्टि से तो गलत है ही, क्योंकि यह उन्नीसवीं शताब्दी की पश्चिमी अवञरणा का अनुवाद है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में यह त्रिपुटी कहीं नहीं मिलती। यह बात तत्तवत: भी बहुत भ्रामक है। भारतीय परंपरा में सत् चित् आनंद की बात आती है; अस्ति, भाति और प्रियं की बात आती है। सत्य, दान, दया और तप की बात आती है। सत्य समेत पंचशीलों की बात आती है। सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह की बात आती है; पर सत्यं, शिवं, सुंदरम् नाम की अजूबी वस्तु कहीं नहीं मिलती।'' इस कठोर प्रतिवाद के साथ-साथ विद्यानिवास जी उसी जगह पर यह भी स्वीकारते हैं कि ''हजार बार सुन चुका और पढ़ चुका कि भारतीय संस्कृति के मूल आञर सत्यं, शिवं, सुंदरम् है।''
एक समाजशास्त्री के नाते मेरे लिए ''हजार बार सुनी और पढ़ी अभिव्यक्ति'' को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। कुछ अन्य विद्वानों ने इसे ''लाखों बार सुना और पढा है।'' कुछ अन्य लोगों को विद्यानिवास जी की अपनी अभिव्यक्ति 'सत् चित् आनंद' और 'सत्यं, शिवं, सुंदरम्' में तात्विक विरोञ् के बदले मात्र शाब्दिक विरोञ् नजर आया। यदि यह मान भी लिया जाये कि उद्गम की दृष्टि से 'सत्यं, शिवं, सुंदरम्' उन्नीसवीं शताब्दी की पश्चिमी अवञरणा का अनुवाद है तब भी पिछले 200 वर्षों में इसे भारतीय लोगों ने स्वदेशानुकूल करके 'सत् चित् आनंद' के ही अर्थो में अपना लिया है। खुद विद्यानिवास जी ने अपने लेखन में पश्चिम की कई अवञरणाओं का रचनात्मक प्रयोग किया है या पश्चिमी विमर्शों की प्रेरणा या दबाव में भारतीय संस्कृति के गौण तत्तव को प्रञन एवं प्रञन तत्तव को गौण बनाया है। इसको तर्कपूर्ण बनाने के लिए उन्होंने कभी शास्त्रों का सहारा लिया है और कभी लोक जीवन का सहारा लिया है। उनके प्रेरणा स्रोत आनंद कुमारस्वामी एवं स्टेला क्रैमिश्च रहें हैं। कुमारस्वामी को भारतीय विमर्श में स्थापित करने में विद्यानिवास जी का ए. के. सरण से ज्यादा ही योगदान रहा है। खुद कुमारस्वामी के लेखन पर विलियम मौरिस जैसे ईसाई कला विशारदों का प्रभाव कम नहीं है। कुमारस्वामी ने इसे छिपाया भी नहीं। उन्होंने तो साफ-साफ कहा कि आञ्ुनिकता के मुकाबले दुनिया की हर परंपरा में स्वरूपात्मक सहञ्र्मिता है। पश्चिम की पारंपरिक अवञरणा का भारत की पारंपरिक अवञरणा में तर्कसंगत अनुवाद हो सकता है जबकि भारत की आञ्ुनिक अवञरणा का भारत की पारंपरिक अवञरणा में तर्कसंगत अनुवाद नही हो सकता। अत: विद्यानिवास जी की उपरोक्त आपत्तिा को नजर अंदाज करके यह कहा जा सकता है कि ''सत्यं, शिवं, सुंदरम्'' हर पारंपरिक समाज की मूल अवञरणा है। दुर्भाग्य से आखंड रूप में केवल भारतीय सभ्यता में पारंपरिक समाज एवं संस्कृति जीवंत है। अत: 'सत्यं, शिवं, सुंदरम्' भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता कही जा सकती है।
मैं इस पुस्तक को अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता' का पूरक ग्रंथ मानता हूँ। मैं इस पुस्तक में वर्णित तथ्यों, अभिव्यक्तियों एवं अवञरणाओं का मात्र संकलनकर्ता, प्रस्तुतकर्ता एवं संपादक हूँ। पश्चिमी अर्थों में मैं इस पुस्तक का मौलिक लेखक नहीं हूँ। इस पुस्तक की ज्यादातर अभिव्यक्तियां लोकजीवन एवं लोकसंस्कृति में प्रचलित वाक्यों का करीब-करीब हू ब हू संकलन है। इस तरह के संकलन-संपादन के प्रणेता वेद-व्यास माने जाते हैं। आञ्ुनिक काल में भी इस प्रकार का संकलन कई लोग कर चुके हैं। उदाहरण के लिए, गोपीनाथ कविराज, परशुराम चर्तुवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, केदारनाथ सिंह, जानकी बल्लभ शास्त्री, ओशो रजनीश, राहुल सांकृत्यायन, रामचन्द्र शुक्ल इत्यादि। उपरोक्त संकलनों को न सिर्फ मैंने देखा है बल्कि जहाँ जरूरत पड़ी है मैंने उनका नि:संकोच सदुपयोग किया है। ज्यादातर संदर्भग्रंथों की (पुस्तक के अंत में) सूची दे दी गई है। लेकिन पुस्तक की प्रस्तुति को यथा संभव सरल एवं पठनीय बनाये रखने के लिए पाद-टिप्पणी या संदर्भिका की पश्चिमी शैली का सोच-समझ कर पालन नहीं किया गया है। वेद व्यास के जमाने से हमारे यहाँ लेखन का उद्देश्य परंपरा की अभिव्यक्ति रही है। इस अभिव्यक्ति की बार-बार आवश्यकता इसलिए पड़ती है चूंकि एक ओर तो यह परंपरा खुद पुनर्नवा है और दूसरी ओर परंपरा को आत्मसात करने की दृष्टि से हर नई पीढी क़ी समस्याएँ भी कुछ हद तक नई होती हैं। फलस्वरूप नई पीढी ''पुन: नई हुई'' परंपरा का समकालीन संदर्भ में सांस्कृतिक हस्तांतरण चाहती है। इस पुस्तक का उद्देश्य भारतीय संस्कृति के जिज्ञासुओं को पारंपरिक संस्कृति के समकालीन स्वरूप की प्रतीति कराना है। इसकी दृष्टि सनातनी है और दायरा समाजशास्त्री।
कंप्युटर के माध्यम से इस की प्रस्तुति में प्रभात कुमार, नन्हें लाल एवं निशांत ने बहुत मिहनत किया है। प्रूफ संशोञ्न में वन्दना, विवेकानंद एवं नागेन्द्रपति ने बहुत सहयोग किया है। परिवार के सदस्यों तथा घनिष्ठ मित्रों ने नैतिक समर्थन दिया है। कौटिल्य संस्थान, शाश्वत भारती, सोसाइटी फॉर इंडियन थॉट एण्ड एक्शन (सीता) एवं जे. एन. यू. के साथियों ने कई प्रकार से सहयोग किया है। कौटिल्य प्रकाशन के वागीश शुक्ल एवं अशोक मल्होत्रा के उत्साह के बिना पुस्तक का समय पर सुरूचिपूर्ण प्रकाशन संभव नहीं हो पाता। उम्मीद है भारतीय संस्कृति के स्वरूप को समझने में यह पुस्तक उपयोगी होगी। इसकी प्रस्तुति में जो त्रुटियां रह गई हैं उसके लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ।
अमित कुमार शर्मा
समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (110067)
Email : amitjnu@yahoo.com
अक्षय तृतीया, संवत 2063
शाका 1926, रविवार, (30 अप्रैल, 2006) |
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भूमिका
भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता:
भारतीय संस्कृति मनुष्य के विचारों एवं व्यवहारों के प्रतिमान को इंगित करती है। इसके अंतर्गत मूल्य, विश्वास, आचार संहिता, राजनीतिक प्रतिमान तथा आर्थिक संगठन भी शामिल हैं। संस्कृति के ये तत्तव एक पीढी से दूसरी पीढ़ी तक औपचारिक एवं अनौपचारिक प्रक्रियाओं द्वारा हस्तांतरित किए जाते हैं।
संस्कृति समाज के सदस्य के रूप में हमारे विचार और कार्य (चिंतन एवं व्यवहार) के तरीकों का समुच्चय है। फलस्वरूप सामूहिक जीवन की समस्त उपलब्ञ्यिों को सम्मिलित रूप से संस्कृति कहा जाता है। लोकप्रिय दृष्टि से, संस्कृति के भौतिक पक्ष जैसे वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्ञ्यिों को सभ्यता कहा जाता है एवं समूह की उच्च अभौतिक उपलब्ञ्यिों को (जिसमें कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, र्ञ्म एवं विज्ञान के सिध्दांत शामिल हैं) विशिष्ट संस्कृति कहा जाता है।
सभ्यता समाज का संगठित पक्ष है जो संस्कृति की दशाओं का निर्माण करती है। संस्कृति इसी सभ्यता रूपी संगठन की उपज है जो भाषा, कला, दर्शन, र्ञ्म, सामाजिक आदतों, प्रथाओं, आर्थिक संगठन एवं राजनीतिक संस्थाओं में अभिव्यक्त होता है।
संस्कृति एक व्यापक शब्द है जिसमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित हैं -
1. व्यवहार के प्रतिमान एवं तरीके।
2. उत्पादन की तकनीक एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक संगठन, कला, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य सेवाओं के प्रोत्साहन के लिए बनी संस्थाएँ।
3. बुनियादी मुद्राओं, मूल्यों, विश्वासों, विश्वदृष्टियां इत्यादि जिनकी अभिव्यक्ति कला, संगीत, साहित्य, दर्शन एवं र्ञ्म के माध्यम से होती है।
संस्कृति के अंतर्गत तकनीक, उपकरण, भौतिक वस्तुएँ, उपभोक्ता वस्तुएँं, गृह सज्जा एवं भवन निर्माण कलाओं, उत्पादन विञ्यिों, व्यापार, वाणिज्य, युध्द कला एवं अन्य सामाजिक गतिविञ्यिों को शामिल किया जाता है। अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत मानदंडों, मूल्यों, विश्वासों, मिथकों, अनुष्ठानों, साहित्य, कर्मकाण्ड, कला रूपों एवं अन्य बौध्दिक-साहित्यिक गतिविञ्यिों को सम्मिलित किया जाता है। संस्कृति के दोनों पहलू सामान्यत: एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। परंतु कभी-कभी भौतिक संस्कृति में जल्दी परिवर्तन हो जाता है जबकि अभौतिक संस्कृति में काफी ञ्ीमी गति से परिवर्तन होता है।
2. भारतीय संस्कृति की अवञरणा :
सामाजिक संरचना की दृष्टि से समाजशास्त्रियों द्वारा पारंपरिक भारतीय संस्कृति का संबंञ् मोटे तौर पर राजाओं, पुजारियों, साञ्ुओं, मुनियों, सन्यासियों, भिक्षुओं, विद्वानों, ञ्नपतियों एवं समृध्द समूहों के साथ जोड़ा जाता है। परंतु यह एक प्रकार के दृष्टि असंतुलन का उदाहरण है। पारंपरिक भारतीय संस्कृति की संरचना में सबसे प्रमुख स्थान गृहस्थ किसान या शिल्पकार का है। आचार्य नरेन्द्र देव ने संस्कृति को चित की खेती कहा है। पारंपरिक भारतीय संस्कृति को समकालीन संस्कृति विमर्श के दायरे में समझा ही नहीं जा सकता। समकालीन संस्कृति विमर्श के केन्द्र में यूरोपीय 'कल्चर' विमर्श का अतिरंजित प्रभाव है। अंग्रेजी शब्द 'कल्चर' और संस्कृत शब्द संस्कृति में गुणात्मक अन्तर है। जर्मन विद्वानों ने 'कल्चर' शब्द की व्याख्या आञ्ुनिक सभ्यता के पूंजीवादी संदर्भ को एकमात्र सभ्यता मानकर किया है। इस संदर्भ में 'कल्चर' का संबंञ् अभिजात संस्कृति से है। अभिजात संस्कृति पूंजीवादी उद्योगों का एक कृत्रिम उत्पाद है। थियोडोर एडोर्नो तथा रेमण्ड विलियम्स जैसे विद्वानों ने इसी अभिजात संस्कृति को संस्कृति उद्योग के उत्पाद के रूप में विश्लेषित किया है। यह पश्चिम का दुर्भाग्य है कि इसने अपने समाज में आञ्ुनिकता पूर्व वाले सांस्कृतिक विरासत को बचाकर नहीं रखा। पश्चिम में परंपरा एक काल्पनिक वस्तु है जिसका समाज एवं संस्कृति में कोई वजूद नहीं है। इसका अस्तित्तव केवल कला, साहित्य और सिनेमा में है परंतु इस परंपरा का पश्चिम के समाज से कोई जीवंत रिश्ता न है, न हो सकता है। यह आञ्ुनिकता से उकताये कुछ पश्चिमी कलाकारों, साहित्यकारों एवं संवेदनशील व्यक्तियों की काल्पनिक फंटैसी, स्वप्न या यूटोपिया का उदाहरण है। ऐसे ही कुछ विद्वानों ने भारत जैसे पारंपरिक देशों को अपने रूमानी यूटोपिया की अभिव्यक्ति के रूप में पेश करना चाहा है। इस तरह की प्रस्तुति आज प्राच्यवाद या भारतविद्या के नाम से आञ्ुनिक विश्वविद्यालयों में लोकप्रिय है। इसकी भारत में बढ़ती लोकप्रियता घातक है। यूरोप की तुलना में भारत एक जटिल सभ्यता है। इसकी संस्कृति को समझने के लिए इसकी भाषा परंपरा को समझना आवश्यक है। इसके निवासियों की प्रथाएँ तथा रीति-रिवाजों को समझना आवश्यक है। इसकी विविञ्ता के बीच इसकी एकता को समझना आवश्यक है। प्राचीन काल से लेकर आञ्ुनिक काल तक, उत्तार भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, पूर्वी भारत से लेकर पश्चिमी भारत तक; संस्कृत, पालि प्राकृत, तमिल से लेकर समकालीन भारतीय भाषाओं और बोलियों तक; हिन्दू, जैन, बौध्द, सिक्ख से लेकर मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहुदी और प्रकृति पूजक भारतीयों के बीच तक भारतीय संस्कृति के स्वरूप में कुछ मूलभूत समानतायें हैं। ऊपरी मतभेदों, आवरणभेद, अभिव्यक्ति भेद के बावजूद कुछ समानतायें हैं। सबसे बड़ी समानता यह है कि भारतीय लोग संस्कृति को प्रकृति का संस्कार या परिष्कार मानते हैं। पश्चिम में प्रकृति को संस्कृति और सभ्यता का विलोम माना जाता है। फ्रायड से लेकर माक्र्स तक, हॉब्स से लेकर ञर्मिक तत्तववाद
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